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शास्त्रोक्त संदर्भ ‘वैरागमय ग्रहस्थ जीवन,

प्राचीनकाल में भी ‘वैरागमय ग्रहस्थ जीवन’ व्यतित करने के शास्त्रों में कई प्रमाण मिलते हैं। जो अब भी वही प्रक्रिया अध्यात्म मार्ग पर द्रुत गति से आगे बढ़ने वाले साधनों के लिए उपयुक्त रुप में प्रचलित है। प्राचीनकाल के ऋषि–मुनि आज के साधुओं से सर्वथा भिन्न थे। उनमेंसे अधिकांश ‘वैरागमय ग्रहस्थ जीवन’ व्यतित करते थे। प्रकृति… Continue reading शास्त्रोक्त संदर्भ ‘वैरागमय ग्रहस्थ जीवन,

।। श्रीराममंत्र परम्परा ।।

सम्पूर्ण लोकों के कल्याण की भावना से भगवन श्रीराम ने समस्त स्वर्ग और बैकुण्ठों से परे विशिष्ट साकेतधाम में सर्व प्रथम श्रीसम्प्रदाय रहस्यमय श्रीराम मन्त्र का उपदेश सर्वलोक पराम्बा श्रीसीताजी को दिया। ।। श्रीसीताजी ।। करुणामयी दायस्वरुपा जगस्वरुपा जगत्जननी श्रीसीताजी जो सम्पूर्ण लोकों की श्रियों की श्रीजी हैं उन्होनें श्रीरामतारक मंत्र को प्राप्तकर अपने परमभक्त श्रीरामचर्णानुरागी श्रीहनुमानजी… Continue reading ।। श्रीराममंत्र परम्परा ।।

श्री वैष्णव सम्प्रदाय, द्वारा एवं गोत्र

श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में, भगवान श्रीविष्णु को ईश्वर और पूरी श्रृष्टि का संचालन कर्ता माना जाता हैं. श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के उप-सम्प्रदाय भी हैं. यद्यपी श्रीवैष्णव सम्प्रदाय को स्वामी श्रीरामानन्दाचार्यजी ने नई पहचान प्रदान की है। उसीके तहत चतुः सम्प्रदाय 52द्धारा गोत्र प्रचलन में आए। अत एव श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में स्वामी श्रीरामानंदाचार्यजी द्वारा स्थापित धार्मिक परम्पराओं का… Continue reading श्री वैष्णव सम्प्रदाय, द्वारा एवं गोत्र

श्री वैष्णव जन का अद्भुत शास्त्रीय स्वरूप

भगवान श्रीविष्णु के श्रीमुखसे अपने भक्तों को सम्बोधित करने हेतु जिस शब्द का प्रयोग हुआ है वह शब्द है वैष्णव जन, यानि कि जो भगवान श्रीविष्णु का भक्त है, श्रीविष्णु की पूजा, उपासना, आराधना करने वाला है वह श्रीवैष्णव जन है।  श्रीवैष्णव जन का शास्त्रीय स्वरूप श्रीमद्भागवत पुराण के माहतम्य से लेकर ही वैष्णव शब्द… Continue reading श्री वैष्णव जन का अद्भुत शास्त्रीय स्वरूप

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